विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता व ग़ज़ल

बदलती फिज़ा
माना कि पैसों की अहमियत बहुत है,
इस शहर में मगर आदमियत नहीं है.
विष-बुझे व्यंग्य -बाणों की होती है वर्षा
फिज़ा में इन्द्र-धनुषी रूमानियत नहीं है
कुछ मुस्कुराते हुए चेहरे है…

बदलती फिज़ा
माना कि पैसों की अहमियत बहुत है,
इस शहर में मगर आदमियत नहीं है.
विष-बुझे व्यंग्य -बाणों की होती है वर्षा
फिज़ा में इन्द्र-धनुषी रूमानियत नहीं है
कुछ मुस्कुराते हुए चेहरे है…