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संजय दानी की ग़ज़ल

जब से दिलों की गलियों में ईमान बिकते हैं,

बस तब से राहे-इश्क़ बियाबान लगते हैं।

ग़म से भरी है दास्तां मेरी जवानी की,

बाज़ारे-इश्क़ मे सदा अरमान सड़ते हैं।

साहिल के घर का ज़ुल्म बहुत झेला है…